राज्य में ‘हर घर नल से जल’ योजना के तहत हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाने के बावजूद जमीनी हकीकत चौंकाने वाली सामने आई है। करीब ₹12,764 करोड़ की लागत से लागू इस योजना में सरकार की ओर से हजारों गांवों में हर घर तक पानी पहुंचाने का दावा किया गया है, लेकिन कई इलाकों में नल सूखे पड़े हैं और लोगों को अब भी पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।

प्रमाण खबर की टीम द्वारा किए गए ग्राउंड सर्वे में यह सामने आया कि लगभग 3,129 गांवों को कागजों में जलापूर्ति से जोड़ दिया गया है और इसके प्रमाणपत्र भी जारी कर दिए गए हैं। हालांकि, वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है। कई गांवों में पाइपलाइन तो बिछा दी गई है, लेकिन पानी की नियमित आपूर्ति नहीं हो रही है।

विशेष रूप से देवघर, दुमका, गोड्डा और पाकुड़ जैसे जिलों में स्थिति गंभीर बनी हुई है। यहां कई गांवों में लोगों को आज भी 2 से 3 किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ रहा है। कुछ स्थानों पर आधे से अधिक घरों तक जलापूर्ति पहुंच ही नहीं पाई है, जबकि कागजों में उन्हें ‘पूर्ण’ दिखाया जा चुका है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि योजना के क्रियान्वयन में कई स्तरों पर खामियां हैं। पाइपलाइन और ढांचा तो तैयार कर दिया गया, लेकिन पानी के स्रोत और वितरण व्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया। इसके अलावा ग्राउंड लेवल पर निगरानी की कमी भी एक बड़ी वजह बनकर सामने आई है।
इसका सीधा असर ग्रामीणों के जीवन पर पड़ रहा है। खासकर महिलाएं और बच्चे रोजाना पानी के लिए लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं। गर्मी के मौसम में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है, जब पीने के पानी की कमी साफ दिखाई देने लगती है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या योजनाओं का मूल्यांकन सिर्फ कागजों के आधार पर किया जा रहा है, या जमीनी हकीकत को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर देना काफी नहीं है, बल्कि उसकी नियमित निगरानी और सही संचालन भी उतना ही जरूरी है, तभी ऐसी योजनाओं का वास्तविक लाभ लोगों तक पहुंच सकेगा।