हिंदू धर्म में अधिकमास (अधिमास) को बेहद विशेष और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पवित्र मास 17 मई से 15 जून तक रहेगा। इस अवधि को मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

यह वह समय होता है जब लोग पूजा-पाठ, दान और भक्ति में अधिक ध्यान लगाते हैं, जबकि विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। ऐसे में अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर इस महीने में शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते और इसे पुरुषोत्तम मास क्यों कहा जाता है।

अधिकमास में शुभ कार्य क्यों वर्जित माने जाते हैं?

हिंदू पंचांग के अनुसार अधिकमास एक ऐसा अतिरिक्त महीना होता है, जो समय-गणना को संतुलित करने के लिए जोड़ा जाता है।
इस मास का कोई स्थायी देवता नहीं माना जाता था
इसी कारण इसे पहले “मलमास” यानी त्याज्य मास कहा जाता था
पारंपरिक रूप से इसे सांसारिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना गया
यही वजह है कि इस अवधि में विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते।
कैसे पड़ा इसका नाम पुरुषोत्तम मास?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब इस मास को उपेक्षित और अशुभ माना जाने लगा, तब भगवान Vishnu ने इसे अपना संरक्षण दिया।
उन्होंने इस मास को अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया
साथ ही यह आशीर्वाद दिया कि इस अवधि में की गई भक्ति का फल कई गुना मिलेगा
तभी से अधिकमास को “पुरुषोत्तम मास” के रूप में पूजा जाने लगा
इस मान्यता के कारण आज यह समय भले ही सांसारिक कार्यों के लिए वर्जित हो, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना जाता है।
अधिकमास में क्या करना चाहिए?
यह समय भक्ति और साधना के लिए सबसे उत्तम माना गया है।
भगवान विष्णु की पूजा और मंत्र जाप
श्रीमद्भागवत या धार्मिक ग्रंथों का पाठ
दान-पुण्य, दीपदान और सेवा कार्य
व्रत और ध्यान
मान्यता है कि इस समय किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना अधिक मिलता है।
किन कार्यों से बचना चाहिए?
अधिकमास के दौरान कुछ कार्यों से दूरी बनाना बेहतर माना गया है:
विवाह और सगाई
गृह प्रवेश या नया घर खरीदना
नामकरण और मुंडन संस्कार
नए बड़े कार्यों या योजनाओं की शुरुआत
आध्यात्मिक उन्नति का विशेष अवसर
अधिकमास हमें जीवन की भागदौड़ से हटकर आत्मचिंतन और भक्ति की ओर बढ़ने का अवसर देता है। यह समय बताता है कि कभी-कभी रुककर खुद को भीतर से मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है जितना बाहरी सफलता हासिल करना।