सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार को विधि-विधान और परंपराओं के अनुसार पूरा करने का विशेष महत्व माना गया है। अंतिम संस्कार को भी बेहद पवित्र और आवश्यक संस्कार माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति का अंतिम संस्कार सही रीति से न किया जाए, तो उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती और वह भटकती रह सकती है।
गरुड़ पुराण और सनातन परंपराओं के अनुसार, सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करना शुभ नहीं माना गया है। मान्यता है कि सूर्य ढलने के बाद नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता है और ऐसे समय में अंतिम संस्कार करने से आत्मा को परलोक यात्रा में कष्ट उठाना पड़ सकता है। इसी कारण यदि किसी व्यक्ति का निधन रात में हो जाए, तो सामान्यतः शव को अगले दिन सूर्योदय तक सुरक्षित रखा जाता है और सुबह अंतिम संस्कार किया जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रात में दाह संस्कार करने से आत्मा को पूर्ण शांति नहीं मिलती और अगले जन्म में उसे कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि शास्त्रों में सूर्यास्त के बाद अग्नि देने को उचित नहीं माना गया है।
हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में रात में अंतिम संस्कार की अनुमति भी दी गई है। जैसे महामारी, युद्ध, प्राकृतिक आपदा या ऐसी स्थिति जब शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखना संभव न हो। ऐसी स्थिति में विशेष दोष निवारण विधि करने का उल्लेख मिलता है।
शास्त्रों में मानव शरीर को पांच तत्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — से बना माना गया है। अंतिम संस्कार के दौरान शरीर इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यह प्रक्रिया सही विधि से पूरी होने पर आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है।
परंपरा के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु रात में होती है तो शव को घर में तुलसी के पास रखा जाता है और उसके आसपास दीपक जलाया जाता है। इसके बाद सूर्योदय होने पर शव को श्मशान ले जाकर अंतिम संस्कार किया जाता है।
धार्मिक ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि यदि दिन में मृत्यु हो जाए, तो यथासंभव सूर्यास्त से पहले अंतिम संस्कार कर देना चाहिए। सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार को शास्त्रों के विरुद्ध माना गया है।



