कुछ साल पहले तक ऐसा माना जा रहा था कि वायर्ड इयरफोन का दौर खत्म हो जाएगा और उनकी जगह पूरी तरह वायरलेस ईयरबड्स ले लेंगे। लेकिन अब ट्रेंड बदलता नजर आ रहा है। भारत समेत दुनिया भर में कई सेलेब्रिटी और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स फिर से वायर्ड इयरफोन इस्तेमाल करते दिखाई दे रहे हैं, जिसके बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वायर्ड इयरफोन ज्यादा सुरक्षित और बेहतर हैं।
GenZ यूजर्स के बीच भी वायर्ड इयरफोन अब “रेट्रो” और “रियल” स्टाइल के रूप में देखे जा रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि वायर्ड इयरफोन ज्यादा आसान होते हैं क्योंकि इनमें बैटरी, चार्जिंग या ब्लूटूथ पेयरिंग जैसी परेशानियां नहीं होतीं। वहीं वायरलेस ईयरबड्स के साथ कनेक्शन ड्रॉप, बैटरी खत्म होने और ऑडियो लैग जैसी समस्याओं की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
स्वास्थ्य को लेकर भी वायरलेस ईयरबड्स पर लगातार बहस होती रही है। कुछ लोग मानते हैं कि ब्लूटूथ डिवाइस कान के पास रेडिएशन छोड़ते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक अभी तक ऐसा कोई मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है जो सामान्य उपयोग में इन्हें खतरनाक साबित करता हो। डॉक्टरों का कहना है कि असली खतरा रेडिएशन नहीं बल्कि लंबे समय तक तेज आवाज में गाने सुनना है।

विशेषज्ञों के अनुसार, चाहे वायर्ड हो या वायरलेस, दोनों तरह के इयरफोन अगर लंबे समय तक हाई वॉल्यूम पर इस्तेमाल किए जाएं तो सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। हालांकि वायरलेस ईयरबड्स कान के अंदर ज्यादा गहराई तक फिट होते हैं, जिससे ईयरवैक्स, जलन या संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
ऑडियो एक्सपर्ट्स यह भी मानते हैं कि वायर्ड इयरफोन में साउंड क्वालिटी ज्यादा स्थिर और डिले-फ्री होती है। यही वजह है कि गेमिंग, वीडियो एडिटिंग और म्यूजिक प्रोडक्शन जैसे प्रोफेशनल कामों में आज भी वायर्ड ऑडियो डिवाइस को प्राथमिकता दी जाती है।

हालांकि वायरलेस ईयरबड्स के अपने फायदे भी हैं। इनमें एक्टिव नॉइज़ कैंसलेशन, स्मार्ट कंट्रोल और पोर्टेबिलिटी जैसी सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए दोनों विकल्पों के अपने फायदे और नुकसान हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी प्रकार के इयरफोन का इस्तेमाल सीमित समय तक और कम वॉल्यूम पर करना ही कानों की सेहत के लिए सबसे सुरक्षित तरीका है।


